7 Best Moral stories in Hindi  | Short panchatantra stories in hindi with moral  | पंचतंत्र की कहानियां

Top 7 Moral stories in Hindi  | Short panchatantra stories in hindi with moral  | पंचतंत्र की कहानियां

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Moral stories in Hindi – पंचतंत्र की कहानियां

Story 1 : ब्राह्मण, चोर, और दानव की कथा – Stories in hindi

एक गाँव में द्रोण नाम का ब्राह्मण रहता था । भिक्षा माँग कर उसकी जीविका चलती थी । सर्दी-गर्मी रोकने के लिये उसके पास पर्याप्त वस्त्र भी नहीं थे । एक बार किसी यजमान ने ब्राह्मण पर दया करके उसे बैलों की जोड़ी दे दी । ब्राह्मण ने उनका भरन-पोषण बड़े यत्‍न से किया । आस-पास से घी-तेल-अनाज माँगकर भी उन बैलों को भरपेट खिलाता रहा । इससे दोनों बैल खूब मोटे-ताजे हो गये । उन्हें देखकर एक चोर के मन में लालच आ गया । उसने चोरी करके दोनों बैलों को भगा लेजाने का निश्चय कर लिया । इस निश्चय के साथ जब वह अपने गाँव से चला तो रास्ते में उसे लंबे-लंबे दांतों, लाल आँखों, सूखे बालों और उभरी हुई नाक वाला एक भयङकर आदमी मिला ।

उसे देखकर चोर ने डरते-डरते पूछा—-“तुम कौन हो ?”

उस भयङकर आकृति वाले आदमी ने कहा—-“मैं ब्रह्मराक्षस हूँ, तुम कौन हो ?”

चोर ने कहा –“में चोर हु , पास वाले ब्राह्मण के घर से बैलों की जोड़ी चुराने जा रहा हूँ ।”

राक्षस ने कहा —-“मित्र ! पिछले छः दिन से मैंने कुछ भी नहीं खाया । चलो, आज उस ब्राह्मण को मारकर ही भूख मिटाऊँगा । हम दोनों एक ही मार्ग के यात्री हैं । चलो, साथ-साथ चलें ।”

शाम को दोनों छिपकर ब्राह्मण के घर में घुस गये । ब्राह्मण के शैयाशायी होने के बाद राक्षस जब उसे खाने के लिये आगे बढ़ने लगा तो चोर ने कहा—-“मित्र ! यह बात न्यायानुकूल नहीं है । पहले मैं बैलों की जोड़ी चुरा लूँ, तब तू अपना काम करना ।”

राक्षस ने कहा—-“कभी बैलों को चुराते हुए खटका हो गया और ब्राह्मण जाग पड़ा तो अनर्थ हो जायगा, मैं भूखा ही रह जाऊँगा । इसलिये पहले मुझे ब्राह्मण को खा लेने दे, बाद में तुम चोरी कर लेना ।”

चोर ने उत्तर दिया —-“ब्राह्मण की हत्या करते हुए यदि ब्राह्मण बच गया और जागकर उसने रखवाली शुरु कर दी तो मैं चोरी नहीं कर सकूंगा । इसलिये पहले मुझे अपना काम कर लेने दे ।”

दोनों में इस तरह की कहा-सुनी हो ही रही थी कि शोर सुनकर ब्राह्मण जाग उठा । उसे जागा हुआ देख चोर ने ब्राह्मण से कहा—-“ब्राह्मण ! यह राक्षस तेरी जान लेने लगा था, मैंने इसके हाथ से, तेरी रक्षा की है  ।”

राक्षस बोला—-“ब्राह्मण ! यह चोर तेरे बैलों को चुराने आया था, मैंने उसे बचा लिया ।”

इस बातचीत में ब्राह्मण सावधान हो गया । लाठी उठाकर वह अपनी रक्षा के लिये तैयार हो गया । उसे तैयार देखकर चोर और राक्षस दोनों भाग गये ।

Story 2 : गीदड़ गीदड़ ही रहता है – Stories in hindi

एक जंगल में शेर-शेरनी का युगल रहता था । शेरनी के दो बच्चे हुए । शेर प्रतिदिन हिरणों को मारकर शेरनी के लिये लाता था । दोनों मिलकर पेट भरते थे । एक दिन जंगल में बहुत घूमने के बाद भी शाम होने तक शेर के हाथ कोई शिकार न आया । खाली हाथ घर वापिस आ रहा था तो उसे रास्ते में गीदड़ का बच्चा मिला।

बच्चे को देखकर उसके मन में दया आ गई; उसे अपने मुख में सुरक्षा-पूर्वक लेकर वह घर आ गया और शेरनी के सामने उसे रखते हुए बोला—-“प्रिये ! आज भोजन तो कुछ़ मिला नहीं । रास्ते में गीदड़ का यह बच्चा खेल रहा था । उसे जीवित ही ले आया हूँ । तुझे भूख लगी है तो इसे खाकर पेट भरले । कल दूसरा शिकार लाऊँगा ।”

शेरनी बोली—-“प्रिय ! जिसे तुमने बालक जानकर नहीं मारा, उसे मारकर मैं कैसे पेट भर सकती हूँ ! मैं भी इसे बालक मानकर ही पाल लूँगी । समझ लूँगी कि यह मेरा तीसरा बच्चा है ।”

गीदड़ का बच्चा भी शेरनी का दूध पीकर खूब पुष्ट हो गया । और शेर के अन्य दो बच्चों के साथ खेलने लगा । शेर-शेरनी तीनों को प्रेम से एक समान रखते थे ।

कुछ दिन बाद उस वन में एक मत्त हाथी आ गया । उसे देख कर शेर के दोनों बच्चे हाथी पर गुर्राते हुए उसकी ओर लपके । गीदड़ के बच्चे ने दोनों को ऐसा करने से मना करते हुए कहा—- “यह हमारा कुलशत्रु है । उसके सामने नहीं जाना चाहिये । शत्रु से दूर रहना ही ठीक है ।”

यह कहकर वह घर की ओर भागा । शेर के बच्चे भी निरुत्साहित होकर पीछे़ लौट आये ।

घर पहुँच कर शेर के दोनों बच्चों ने माँ-बाप से गीदड़ के बच्चे के भागने की शिकायत करते हुए उसकी कायरता का उपहास किया । गीदड़ का बच्चा इस उपहास से बहुत क्रोधित हो गया । लाल-लाल आंखें करके और होठों को फड़फड़ाते हुए वह उन दोनों को जली-कटी सुनाने लगा । तब, शेरनी ने उसे एकान्त में बुलाकर कहा कि—-“इतना प्रलाप करना ठीक नहीं, वे तो तेरे छो़टे भाई हैं, उनकी बात को टाल देना ही अच्छा़ है ।”

गीदड़ का बच्चा शेरनी के समझाने-बुझाने पर और भी भड़क उठा और बोला —“मैं बहादुरी में, विद्या में या कौशल में उनसे किस बात में कम हूँ, जो वे मेरी हँसी उड़ाते हैं; मैं उन्हें इसका मजा़ चखाऊँगा, उन्हें मार डालूँगा ।”

यह सुनकर शेरनी ने हँसते-हँसते कहा—-“तू बहादुर भी है, विद्वान् भी है, सुन्दर भी है, लेकिन जिस कुल में तेरा जन्म हुआ है उसमें हाथी नहीं मारे जाते । समय आ गया है कि तुझ से सच बात कह दी देनी चाहिये । तू वास्तव में गीदड़ का बच्चा है । मैंने तुझे अपना दूध देकर पाला है । अब इससे पहले कि तेरे भाई इस सचाई को जानें, तू यहाँ से भागकर अपने स्वजातियों से मिल जा । अन्यथा वह तुझे जीता नहीं छो़डेंगे ।”

यह सुनकर वह डर से काँपता हुआ अपने गीदड़ दल में आ मिला ।

Story 3 : सच्चे मित्र -हिरण, कबूतर और चूहा -Stories in hindi

एक जंगल में एक कबूतर , चूहा और एक हिरण तीनों घनिष्ठ मित्र रहा करते थे। जंगल में बने सरोवर में पानी पीते फल खाते और वही सरोवर के आसपास घुमा फिरा करते थे।

एक समय की बात है,

जंगल में एक शिकारी , शिकार करने आया उसने हिरण को पकड़ने के लिए जाल बिछाया।

काफी प्रयत्न और मेहनत से शिकारी ने जाल को छिपाकर लगाने सफलता पा ली। शिकारी के जाल में  हिरण आसानी से फंस गया। इस पर कबूतर ने कहा घबराओ मत मित्र मैं देखता हूं शिकारी कहां है और कितनी दूर है मैं। मैं उसको रोकता हूं जब तक हमारा मित्र चूहा तुम्हारे जाल को कुतर देगा और तुम जल्दी से निकल जाओगे।

यही हुआ कबूतर ने शिकारी को ढूंढना शुरू किया।

वह दूर था कबूतर ने अपने प्राण को जोखिम में डालकर शिकारी के ऊपर वार करना शुरू कर दिया। कबूतर के प्रहार से  शिकारी को कुछ समझ में नहीं आया और वह परेशान होकर बचने लगा मगर कबूतर शिकारी को ज्यादा देर तक रोक नहीं पाया।

शिकारी ने जल्दी ही कबूतर पर काबू पा लिया और वह जाल की ओर आया।

यहां चूहे  ने जाल को लगभग काट दिया था अब हिरण आजाद होने वाला था , तभी शिकारी वहां पहुंचा इतने में कबूतर का एक झुंड वह जल्दी से आकर उस शिकारी के ऊपर ताबड़तोड़ आक्रमण कर दिया।

इस आक्रमण से  शिकारी घबरा गया।

थोड़ा सा समय उन कबूतर पर काबू पाने में लगा। इतने मे चूहे ने निडर भाव से जाल को कुतर दिया जिससे हिरण आजाद हो गया। अब क्या था हिरण और चूहा अपने अपने रास्ते भाग चलें। कुछ दूर भागे होंगे उन्होंने पीछे मुड़कर देखा तो उनका मित्र कबूतर शिकारी के चंगुल में आ गया था।

हिरण ने सोचा उसने मेरी जान बचाने के लिए अपनी जान खतरे में डाल दी।

इस पर हिरण धीरे – धीरे लंगड़ाकर चलने लगा शिकारी को ऐसा लगा कि हिरण घायल है  उसके पैर में चोट लगी है इसलिए वह धीरे धीरे चल रहा है , वह भाग नहीं सकता।

शिकारी ने झट से कबूतर को छोड़ दिया और हिरण की तरफ दौड़ा।

शिकारी को आता देख  कबूतर उड़ कर आकाश में चल पड़ा हिरण जो अभी नकल कर रहा था वह भी तेज दौड़ कर भाग गया और चूहा दौड़ कर बिल में घुस गया।

इस प्रकार तीनों दोस्तों की सूझबूझ ने एक दूसरे की रक्षा की।

Story 4 : दो मछलियों और एक मेंढक की कथा – Stories in hindi

एक तालाब में दो मछ़लियाँ रहती थीं । एक थी शतबुद्धि (सौ बुद्धियों वाली), दूसरी थी सहस्त्रबुद्धि (हजार बुद्धियों वाली) । उसी तालाब में एक मेंढक भी रहता था । उसका नाम था एकबुद्धि । उसके पास एक ही बुद्धि थी । इसलिये उसे बुद्धि पर अभिमान नहीं था । शतबुद्धि और सहस्त्रबुद्धि को अपनी चतुराई पर बड़ा अभिमान था।

एक दिन सन्ध्या समय तीनों तालाब के किनारे बात-चीत कर रहे थे। उसी समय उन्होंने देखा कि कुछ़ मछि़यारे हाथों में जाल लेकर वहाँ आये । उनके जाल में बहुत सी मछ़लियाँ फँस कर तड़प रही थीं । तालाब के किनारे आकर मछि़यारे आपस में बात करने लगे । एक ने कहा – “इस तालाब में खूब मछ़लियाँ हैं, पानी भी कम है। कल हम यहाँ आकर मछ़लियां पकड़ेंगे ।”

सबने उसकी बात का समर्थन किया। कल सुबह वहाँ आने का निश्चय करके मछि़यारे चले गये। उनके जाने के बाद सब मछ़लियों ने सभा की। सभी चिन्तित थे कि क्या किया जाय। सब की चिन्ता का उपहास करते हुये सहस्त्रबुद्धि ने कहा—“डरो मत, दुनियां में सभी दुर्जनों के मन की बात पूरी होने लगे तो संसार में किसी का रहना कठिन हो जाय । सांपों और दुष्टों के अभिप्राय कभी पूरे नहीं होते; इसीलिये संसार बना हुआ है । किसी के कथनमात्र से डरना कापुरुषों का काम है । प्रथम तो वह यहाँ आयेंगे ही नहीं, यदि आ भी गये तो मैं अपनी बुद्धि के प्रभाव से सब की रक्षा करलूँगी ।”

शतबुद्धि ने भी उसका समर्थन करते हुए कहा – “बुद्धिमान के लिए संसार में सब कुछ़ संभव है। जहां वायु और प्रकाश की भी गति नहीं होती, वहां बुद्धिमानों की बुद्धि पहुँच जाती है। किसी के कथनमात्र से हम अपने पूर्वजों की भूमि को नहीं छो़ड़ सकते। अपनी जन्मभूमि में जो सुख होता है वह स्वर्ग में भी नहीं होता । भगवान ने हमें बुद्धि दी है, भय से भागने के लिए नहीं, बल्कि भय का युक्तिपूर्वक सामना करने के लिए ।”

तालाब की मछ़लियों को तो शतबुद्धि और सहस्त्रबुद्धि के आश्‍वासन पर भरोसा हो गया, लेकिन एकबुद्धि मेंढक ने कहा—“मित्रो ! मेरे पास तो एक ही बुद्धि है; वह मुझे यहां से भाग जाने की सलाह देती है । इसलिए मैं तो सुबह होने से पहले ही इस जलाशय को छो़ड़कर अपनी पत्‍नी के साथ दूसरे जलाशय में चला जाऊँगा ।” यह कहकर वह मेंढक मेंढकी को लेकर तालाब से चला गया ।

दूसरे दिन अपने वचनानुसार वही मछि़यारे वहाँ आये । उन्होंने तालाब में जाल बिछा़ दिया । तालाब की सभी मछ़लियां जाल में फँस गईं । शतबुद्धि और सहस्त्रबुद्धि ने बचाव के लिए बहुत से पैंतरे बदले, किन्तु मछि़यारे भी अनाड़ी न थे । उन्होंने चुन-चुन कर सब मछ़लियों को जाल में बांध लिया । सबने तड़प-तड़प कर प्राण दिये ।

सन्ध्या समय मछि़यारों ने मछ़लियों से भरे जाल को कन्धे पर उठा लिया । शतबुद्धि और सहस्त्रबुद्धि बहुत भारी मछ़लियां थीं, इसीलिए इन दोनों को उन्होंने कन्धे पर और हाथों पर लटका लिया था । उनकी दुरवस्था देखकर मेंढक ने मेंढकी से कहा-

 “देख प्रिये! मैं कितना दूरदर्शी हूं । जिस समय शतबुद्धि कन्धों पर और सहस्त्रबुद्धि हाथों में लटकी जा रही है, उस समय मैं एकबुद्धि इस छो़टे से जलाशय के निर्मल जल में सानन्द विहार कर रहा हूँ । इसलिए मैं कहता हूँ कि विद्या से बुद्धि का स्थान ऊँचा है, और बुद्धि में भी सहस्त्रबुद्धि की अपेक्षा एकबुद्धि होना अधिक व्यावहारिक है ।”

Story 5 : सुंदरवन की कहानी – Stories in hindi

सुंदरवन नामक एक खूबसूरत जंगल था। वहां खूब ढ़ेर सारे जानवर , पशु – पक्षी रहा करते थे। धीरे – धीरे सुंदरवन की सुंदरता कम होती जा रही थी। पशु-पक्षी भी वहां से कहीं दूसरे जंगल जा रहे थे। कारण यह था कि वहां पर कुछ वर्षों से बरसात नहीं हो रही थी।

जिसके कारण जंगल में पानी की कमी निरंतर होती जा रही थी। पेड़ – पौधों  की हरियाली खत्म हो रही थी , और पशु पक्षियों का मन भी वहां नहीं लग रहा था।

सभी वन को छोड़कर दूसरे वन में जा रहे थे कि गिद्धों ने ऊपर उड़ कर देखा तो उन्हें काले घने बादल जंगल की ओर आते नजर आए।

उन्होंने सभी को बताया कि जंगल की तरफ काले घने बादल आ रहे हैं , अब बारिश होगी।

इस पर सभी  पशु-पक्षी वापस सुंदरबन आ गए। देखते ही देखते कुछ देर में खूब बरसात हुई। बरसात ईतनी हुई कि वह दो-तीन दिन तक होती रही।

सभी पशु पक्षी जब बरसात रुकने पर बाहर निकले तब उन्होंने देखा उनके तालाब और झील में खूब सारा पानी था। सारे पेड़ पौधों पर नए-नए पत्ते निकल आए थे।

इस पर सभी खुशी हुए और सभी ने उत्सव मनाया। सभी का मन प्रसन्नता बत्तख अब झील मैं तैर रहे थे हिरण दौड़-दौड़कर खुशियां मना रहे थे और ढेर सारे पप्पीहे – दादुर मिलकर एक नए राग का अविष्कार कर रहे थे।

इस प्रकार सभी जानवर , पशु – पक्षी खुश थे अब उन्होंने दूसरे वन जाने का इरादा छोड़ दिया था और अपने घर में खुशी खुशी रहने लगे।

Story 6 : चार ब्राह्मण – Stories in hindi

एक गाँव में चार ब्राह्मण रहते थे। उनमे से तीन ब्राह्मणों ने अनोखी विद्याएँ सीख रखी थीं, जबकि एक को कुछ ख़ास नहीं पता था। इसी वजह से बाकी तीनो उसे अज्ञानी वो निरा मूर्ख समझते थे।

एक बार तीन विद्वान् ब्राह्मणों ने शहर जा कर कुछ धनोपार्जन करने का विचार बनाया। उन्हें जाता देखकर चौथा ब्राह्मण भी साथ जाने का आग्रह करने लगा।

“तुम हम विद्वानों के साथ जाकर क्या करोगे? तुम्हे तो कोई ऐसी विद्या भी नहीं आती जिससे तुम धनोपार्जन कर सको? जाओ लौट जाओ..”, तीनो ने उसे लगभग डांटते हुए कहा।

“मम्म… मैं…तुम लोगों के काम कर दिया करूँगा….कृपया मुझे ले चलो।”, चौथा ब्राह्मण आग्रह करते हुए बोला।

काम कराने की लालच में सभी उसकी बात मान गए और वो भी साथ-साथ चल पड़ा।

शहर जाते वक्त रास्ते में एक घना जंगल पड़ता है। चलते-चलते उन्हें एक जगह ढेर सारी हड्डियाँ बिखरी दिखाई पड़ती हैं। सभी वहीँ रुक जाते हैं और इस बात को ले कर विवाद हो जाता है की यह हड्डियाँ किस जानवर की हैं।

तभी एक ब्राहमण बोलता है, ” चलो, बेकार की बहस बंद करो, मैं अभी अपनी तंत्र विद्या से इन हड्डियों को जोड़ देता हूँ…”

और देखते-देखते एक शेर का कंकाल तैयार हो जाता है।

यह देख दूसरा ब्राह्मण अपनी विद्या कर प्रदर्शन कर सबको प्रभावित करना चाहता है और उस कंकाल में मांस व चमड़ी लगा देता है।

अब भला तीसरा ब्राह्मण कहाँ पीछे रहने वाला था, वह हँसते हुए बोला, “तुम सब ये क्या बचकानी हरकतें कर रहे हो? मैं दिखाता हूँ असली विद्या…मैं इस शेर में अभी प्राण फूंक इसे जीवित कर देता हूँ…”

और ऐसा कह कर वह मंत्रोचारण करने लगता है।

“ठहरो-ठहरो!”, चौथा ब्राह्मण जोर से चीखता है….” तुम ये क्या कर रहे हो? अगर ये शेर जीवित हो गया…”

अभी वो अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाता है कि मंत्रोचारण कर रहा ब्राह्मण उस पर गरज पड़ता है, “मूर्ख! अल्प-बुद्धि, विद्वानों के बीच अपनी जुबान दुबारा कभी मत खोलना..”

और वह पुनः मन्त्र पढने लगता है।

चौथा ब्राहमण समझ जाता है कि यहाँ कोई उसकी बात नहीं मानेगा…और वह तेजी से भाग कर एक पेड़ पर चढ़ जाता है।

उधर मन्त्र की शक्ति से शेर में प्राण आ जाते हैं।

शेर तो शेर है..हिंसक…घातक…प्राणनाशक….वह क्या जाने उसे किसने बनाया….क्यों बनाया…वह तो बस मारना और खाना जानता है…

देखते-देखते शेर ने तीनो ब्राह्मणों को मार डाला और अपना पेट भर घने जंगलों में ओझल हो गया।

चौथा ब्राहमण सही समय देखकर गाँव की तरफ वापस लौट गया…वह मन ही मन सोच रहा था,-

ऐसा ज्ञान किस काम का, जो इन्सान की सूझ-बुझ और समझदारी को क्षीण कर दे।

Story 7 : बुरी संगति का फल – Stories in hindi

जंगल में एक सुंदर स्वच्छ जल का तालाब था। उसके किनारे एक बरगद का विशाल वृक्ष था। उस पर एक कौवा रहता था। नीचे तालाब में एक हंस रहता था। हंस स्वभावतः सदाचारी और परोपकारी था।

एक दिन कौवे ने सोचा कि हंस यहां साथ ही रहता है, क्यों न इससे मित्रता कर ली जाय। यह सोचकर उसने हंस से मित्रता का प्रस्ताव रखा। स्वभाव से भोले हंस ने उसकी मित्रता स्वीकार कर ली।

यद्यपि नीति कहती है कि अपने से विपरीत स्वभाव वालों से मित्रता नहीं करनी चाहिए। उसका परिणाम बुरा होता है। तथापि दोनों की मित्रता गाढ़ी हो चली थी। हंस तालाब से निकलकर पेड़ पर आ जाता और कौवे से बातें करता।

इस तरह कई महीने बीत गये। हंस को भी कौवे का साथ अच्छा लगने लगा। एक दिन एक राहगीर सैनिक दोपहर में उस पेड़ के नीचे आकर रुका। अच्छी छाया और तालाब के कारण ठंडी जगह उसे बहुत पसंद आई। उसने वहीं साथ लाया हुआ भोजन किया और पेड़ की छाया में आराम करने लगा।

दोपहर के सूरज की सीधी किरणें उसके चेहरे पर पड़ रहीं थीं। यह देखकर पेड़ पर बैठे परोपकारी हंस ने अपने पंख फैलाकर छाया कर दी। जिससे सैनिक के चेहरे पर धूप न पड़े। लेकिन दुष्ट स्वभाव के कौवे को यह बात पसंद नहीं आयी।

उसने राहगीर सैनिक के चेहरे पर बीट कर दी और उड़ गया। सैनिक बड़ा गुस्सा आया उसने ऊपर देखा तो उसे हंस नजर आया। उसने सोचा कि इसी हंस ने मुझपर बीट की है। सैनिक ने क्रोध में अपना धनुष उठाया और बाण चला दिया।

बाण सीधा हंस को लगा और वह निष्प्राण होकर जमीन पर गिर पड़ा। परोपकार करते हुए भी बुरी संगति के कारण हंस को यह परिणाम भोगना पड़ा।

3 Best short moral stories for kids in hindi – हिंदी

जाते जाते …

यह कहानियाँ , पं. विष्णु शर्मा लिखित सम्पूर्ण पंचतंत्र से ली गयी है, पंचतंत्र कहानियाँ की को पाँच तंत्रों (भागों) में बाँटा गया है और पंचतंत्र की कहानियों में मनुष्य-पात्रों के अलावा काफ़ी बार पशु-पक्षियों को भी इस कथा का पात्र बनाया है, जिससे कई शिक्षाप्रद बातें इस ग्रंथ में कहलवाने की कोशिश की है।

आशा है, यह कहानियां आपको पसंद आई होगी ,आप अपने विचार को हमारे कमेंट बॉक्स में अवश्य लिख सकते है ।

धन्यवाद

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